संस्कृत सुभाषित-3

असतो मा सत् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्माऽमृतं गमय ।
अर्थात:- मानवी जीवन का प्रवास असत् से सत् की ओर, अँधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर हो ।

असतो मा सत् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्माऽमृतं गमय ।
अर्थात:- मानवी जीवन का प्रवास असत् से सत् की ओर, अँधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर हो ।

अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् ।
अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥
अर्थात:- अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्द का अभाव, और दोषरहितत्व – ये छे ‘सूत्र’ के लक्षण कहे गये हैं ।

शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दसामिति ।
ज्योतिषामयनं चैव षडंगो वेद उच्यते ॥
अर्थात:- शिक्षा (उच्चार शास्त्र), कल्पसूत्र, व्याकरण (शब्द/ व्युत्पत्ति शास्त्र), निरुक्त (कोश), छन्द (वृत्त), और ज्योतिष (समय/खगोल शास्त्र) – ये छे वेदांग कहे गये हैं ।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥
अर्थात:- सर्ग (उत्पत्ति), प्रतिसर्ग (लय), पुनरुत्पत्ति, मन्वन्तर (अलग अलग मनु से शुरु होनेवाला काल), और वंशानुचरित (कथाएँ) ये पुराण के पाँच लक्षण हैं ।

ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥
अर्थात:- हे राजा ! ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान, और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यंत दुर्लभ है ।

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याताः
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥
अर्थात:- हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल पसार नहीं हुआ, हम ही पसार हुए हैं; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं !

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥
अर्थात:- हे पार्थ ! तमोगुण से व्याप्त बुद्धि अधर्म को भी यह धर्म है, ऐसा समज बैठती है; और वैसे हि दूसरी हर बात को भी विपरीत समजती है, वह बुद्धि तामसी है ।

तृषा शुष्यत्यास्ये पिबति सलिलं स्वादु सरिभि
क्षुधार्तः सन् शालीन क्वललयति शाकादिवलितान् ।
प्रदीप्ते कामाग्नौ सुदृढतरमाश्लिष्यति वधू
प्रतीकारं व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ॥
अर्थात:- जब प्यास के कारण गला सुख जाता है, तब मनुष्य स्वादिष्ट, सुगंधी जल पीकर प्यास बुझाता है; भूख से व्याकुल होने पर अनेक मधुर रसयुक्त व्यंजन खाकर अपनी भूख मिटाता है । कामाग्नि प्रदिप्त होने पर, वधू को प्रगाढ आलिंगन पाश में लेकर कामाग्नि को शांत करता है । इस प्रकार दुःख की व्याधि को शमन करने के जो उपाय हैं, उन्हीं को मनुष्य भूल से सुख समजता है ।

आशा हि लोकान् बध्नाति कर्मणा बहुचिन्तया ।
आयुः क्षयं न जानाति तस्मात् जागृहि जागृहि ॥
अर्थात:- बडी चिंता कराके, कर्मो द्वारा आशा इन्सान को बंधन में डालती है । इससे खुद के आयुष्य का क्षय हो रहा है, उसका उसे भान नहीं रहेता; इस लिए “जागृत हो, जागृत हो ।”

एकः शत्रु र्न द्वितीयोऽस्ति शत्रुः ।
अज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ॥
अर्थात:- हे राजन् ! इन्सान का एक हि शत्रु है, अन्य कोई नहीं; वह है अज्ञान ।

जन्मदुःखं जरादुःखं मृत्युदुःखं पुनः पुनः ।
संसार सागरे दुःखं तस्मात् जागृहि जागृहि ॥
अर्थात:- संसारसागर में जन्म का, बूढापे का, और मृत्यु का दुःख बार बार आता है, इस लिए (हे मानव !), “जाग, जाग !”

अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् ।
अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥
अर्थात:- अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्द का अभाव, और दोषरहितत्व – ये छे ‘सूत्र’ के लक्षण कहे गये हैं ।

शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दसामिति ।
ज्योतिषामयनं चैव षडंगो वेद उच्यते ॥
अर्थात:- शिक्षा (उच्चार शास्त्र), कल्पसूत्र, व्याकरण (शब्द/ व्युत्पत्ति शास्त्र), निरुक्त (कोश), छन्द (वृत्त), और ज्योतिष (समय/खगोल शास्त्र) – ये छे वेदांग कहे गये हैं ।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥
अर्थात:- सर्ग (उत्पत्ति), प्रतिसर्ग (लय), पुनरुत्पत्ति, मन्वन्तर (अलग अलग मनु से शुरु होनेवाला काल), और वंशानुचरित (कथाएँ) ये पुराण के पाँच लक्षण हैं ।

ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥
अर्थात:- हे राजा ! ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान, और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यंत दुर्लभ है ।

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याताः
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥
अर्थात:- हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल पसार नहीं हुआ, हम ही पसार हुए हैं; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं !

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥
अर्थात:- हे पार्थ ! तमोगुण से व्याप्त बुद्धि अधर्म को भी यह धर्म है, ऐसा समज बैठती है; और वैसे हि दूसरी हर बात को भी विपरीत समजती है, वह बुद्धि तामसी है ।

तृषा शुष्यत्यास्ये पिबति सलिलं स्वादु सरिभि
क्षुधार्तः सन् शालीन क्वललयति शाकादिवलितान् ।
प्रदीप्ते कामाग्नौ सुदृढतरमाश्लिष्यति वधू
प्रतीकारं व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ॥
अर्थात:- जब प्यास के कारण गला सुख जाता है, तब मनुष्य स्वादिष्ट, सुगंधी जल पीकर प्यास बुझाता है; भूख से व्याकुल होने पर अनेक मधुर रसयुक्त व्यंजन खाकर अपनी भूख मिटाता है । कामाग्नि प्रदिप्त होने पर, वधू को प्रगाढ आलिंगन पाश में लेकर कामाग्नि को शांत करता है । इस प्रकार दुःख की व्याधि को शमन करने के जो उपाय हैं, उन्हीं को मनुष्य भूल से सुख समजता है ।

आशा हि लोकान् बध्नाति कर्मणा बहुचिन्तया ।
आयुः क्षयं न जानाति तस्मात् जागृहि जागृहि ॥
अर्थात:- बडी चिंता कराके, कर्मो द्वारा आशा इन्सान को बंधन में डालती है । इससे खुद के आयुष्य का क्षय हो रहा है, उसका उसे भान नहीं रहेता; इस लिए “जागृत हो, जागृत हो ।”

एकः शत्रु र्न द्वितीयोऽस्ति शत्रुः ।
अज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ॥
अर्थात:- हे राजन् ! इन्सान का एक हि शत्रु है, अन्य कोई नहीं; वह है अज्ञान ।

जन्मदुःखं जरादुःखं मृत्युदुःखं पुनः पुनः ।
संसार सागरे दुःखं तस्मात् जागृहि जागृहि ॥
अर्थात:- संसारसागर में जन्म का, बूढापे का, और मृत्यु का दुःख बार बार आता है, इस लिए (हे मानव !), “जाग, जाग !”

Author: kv1devlalilibrary

Kendirya Vidyalaya No.1, Devlali Near Devi Mandir, Rest Camp Road, Devlali Nashik, Maharashtra-422 401 E-mail: kv1devlibrary@gmail.com Web site: www.kv1devlalilibrary.wordpress.com

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