शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता एवं महत्व

 शैक्षिक निर्देशन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों की इस प्रकार सहायता करना है जिससे वे विद्यालय पाठ्यक्रम तथा सम्बन्धित सामाजिक जीवन में स्वयं को समायोजित कर सकें। जब विद्यार्थी नवीन विद्यालयों में प्रवेश लेते हैं या ग्रामीण क्षेत्रों के बालक समुचित शिक्षा उपलब्ध न होने पर नगरों में स्थित विद्यालयों में प्रवेश लेते हैं तो उनको नया वातावरण व नया सामाजिक जीवन मिलता है। जिसमें वे स्वयं को समायोजित नही कर पाते तथा विभिन्न कठिनाइयों का अनुभव करते है। शैक्षिक निर्देशन नवीन वातावरण में समायोजन स्थापित करने में विद्यार्थियों की सहायता करता है। 

 प्रत्येक विद्यार्थी की रूचियाँ, अभिक्षमताएँ व योग्यताएँ एक की अपेक्षा दूसरे से भिन्न होती है। किसी में बुद्धि अधिक होती है तो किसी में कम। वर्तमान समय में विद्यार्थियों को उनकी योग्यताओं, बौद्धिक क्षमताओं, रूचियों, अभिरूचियों व व्यक्तिगत शीलगुणों से अवगत कराने के लिए शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त आवश्यक है।

जी.र्इ. मायर्स के अनुसार, ‘‘शैक्षिक निर्देशन एक ऐसी प्रक्रिया है जो एक ओर तो विशिष्ट गुण वाले छात्रों में और दूसरी ओर अवसरों और आवश्यकताओं के विभिन्न समूहों में ऐसा सम्बन्ध स्थापित करती है, जिससे व्यक्ति के विकास और उसकी शिक्षा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण होता है।’’ मायर्स द्वारा दी गर्इ परिभाशा द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि निर्देशन द्वारा छात्र की विशेषताओं तथा शैक्षिक अवसरों के मध्य सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।

निर्देशन सेवाओं का क्षेत्र एवं कार्य विद्यार्थियो को शैक्षिक एवं व्यावसायिक चयन (choices) में सहायता तक ही सीमित नहीं है अपितु कहीं अधिक व्यापक हैं| निर्देशन का लक्ष्य समायोजन (Adjustment) एवं विकास (Development) दोनों में सहायता पहुँचाना है| निर्देशन जहाँ बालक को स्कूल एवं घर की परिस्थितियों में सर्वोत्तम संभावित समायोजन प्राप्त करने में सहायता पहुँचाता है, वहां बालक के व्यक्तित्व के सभी पक्षों का विकास भी उसका लक्ष्य है | इसलिए निर्देशन को शिक्षा का संघटक अंग माना जाना चाहिए| केवल शैक्षिक उद्देश्यों से प्रदान की जाने वाली मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सेवा तक ही वह सीमित नहीं है अपितु सभी विद्यार्थियो के लिए अपरिहार्य है, यह एक निरंतर चलने वाला प्रक्रम (Continuous Process) है जो व्यक्ति को समय- समय पर निर्णय करने एवं समायोजन में सहायता करता है | 

जोन्स ने शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा इस प्रकार दी है, ‘‘शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य विषय और विद्यालय जीवन के चयन तथा अनुकूलन हेतु छात्रों को दी जाने वाली सहायता से है।’’ लेकिन जोन्स शैक्षिक निर्देशन तथा शिक्षण को एक ही मानते हैं। एक स्थान पर वह कहते हैं, ‘‘प्रभावशाली शिक्षण जो कि निर्देशन भी है, समाज तथा विद्यालय से ही प्राप्त किया जा सकता है।’’ जोन्स से मिलती-जुलती परिभाषा होपकिंस द्वारा दी गयी है, ‘‘निर्देशन समस्त उचित अधिगम का एक अंग है अतएव अधिगम परिस्थितियों के कुशल प्रबन्ध में निर्देशन केन्द्रित होना चाहिए।’’ 

 ‘‘शैक्षिक निर्देशन व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहायता प्रदान करने का सचेतन प्रयत्न है’’, ‘‘शिक्षण या अधिगम के लिए किए गए सभी प्रयत्न शैक्षिक निर्देशन के अंग हैं।’’ ब्रेवर के अनुसार विद्यालय में प्रदान की जाने वाली प्रत्येक प्रकार की सहायता शैक्षिक निर्देशन है। ब्रेवर इस प्रकार शैक्षिक निर्देशन तथा संगठित शिक्षा में कोर्इ अन्तर नहीं पाते हैं।

शैक्षिक निर्देशन  की आवश्यकता
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर शिक्षा के क्षेत्र में पहले की अपेक्षा अब अधिक परिवर्तन हुए हैं। व्यक्ति तथा समाज की आवश्यकताओं के आधार पर शिक्षा के उद्देश्य निश्चित होते हैं। समाज अधिक जटिल होता गया, विचारधारा में परिवर्तन हुए। उसके अनुसार ही शिक्षा के उद्देश्य तथा उन उद्देश्यों तक पहुंचने की विधि में भी परिवर्तन हुए। हमारे देश में भी प्राथमिक तथा माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में सुधार तथा पुर्नसंगठन हो रहा है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का प्रमुख दोष यह है कि यह मनुष्य को वास्तविक जीवन के लिए तैयार नही करती है। निम्नलिखित दृष्टियों से भी शैक्षिक निर्देशन आवश्यक है।
१. अग्रिम शिक्षा का निश्चय – हमारे देश में शैक्षिक निर्देशन के अभाव से छात्र अग्रिम शिक्षा का उचित निश्चय नही कर पाते हैं। हार्इस्कूल परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त छात्रों के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि उनको व्यावसायिक विद्यालय में, औद्योगिक विद्यालय में या व्यापारिक विद्यालय में कहाँ जाना चाहिए। कभी-कभी छात्र गलत विद्यालयों में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे विद्यालयों में बाद में वे समायोजित नही हो पाते हैं। छात्रों को उचित अग्रिम शिक्षा का निर्णय लेने के लिए शैक्षिक पथ-प्रदर्शन अवश्य दिया जाए।
२. पाठ्य-विषयों का चुनाव – ‘माध्यमिक शिक्षा आयोग’  ने अपने प्रतिवेदन में विविध, पाठ्यक्रम का सुझाव दिया है। छात्रों में जब व्यक्तिगत विभिन्नता पायी जाती है, उनकी क्षमताएं, योग्यताएं, रूचियां समान नही होती, तो उनको एक ही पाठ्यक्रम का अध्ययन कराना उचित नही है। उस प्रतिवेदन के अनुसार कुछ आन्तरिक विषय तथा इनके अतिरिक्त कुछ वैकल्पिक विषय रखे गये हैं, जिनको 7 वर्गों में विभाजित किया गया है। इन वर्गों को चुनाव करना एक कठिन कार्य है। यहाँ विद्यालयों में छात्रों को विषयों के चयन करते समय किसी प्रकार का पथ-प्रदर्शन नही दिया जाता है। छात्रों को स्वयं के तथा पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में कोर्इ ज्ञान नही होता है। वे नही जानते हैं कि किस विषय का किस वृत्ति से सम्बन्ध है। ये छात्र अपने माता-पिता के परामर्श से या स्वयं उन विषयों को चुन लेते हैं, जो उनको रूचिकर या सरल दिखते हैं। इस प्रकार गलत पाठ्यक्रम का चुनाव करने से छात्र अवरोधन तथा अपव्यय की समस्या को बढ़ाते हैं। गलत पाठ्यक्रम का चुनाव मुख्यत: दो कारणों से होता है :
(अ). कम योग्यता तथा उच्च महत्वाकांक्षा के कारण पाठ्य-विषयों का गलत चुनाव करना। बहुत से छात्र, जिनकी बुद्धि-लब्धि कम होती है, विज्ञान या गणित आदि जैसे कठिन विषय चुन लेते हैं। इसका दुष्परिणाम एक ही कक्षा में बार-बार अनुत्तीर्ण होना होता है।
(ब). उच्च योग्यता तथा निम्न महत्वाकांक्षा भी गम्भीर समस्याएं उत्पन्न करती हैं। अधिकांश छात्र प्रखर बुद्धि के होने पर सरल विषय चुन लेते है। इस तरह उनकी प्रखर बुद्धि का लाभ राष्ट्र या स्वयं उस छात्र को नही मिल पाता है। इसको रोकने के लिए शैक्षिक निर्देशन अति आवश्यक है।
३. अग्रिम शिक्षा का निश्चय – हमारे देश में शैक्षिक निर्देशन के अभाव से छात्र अग्रिम शिक्षा का उचित निश्चय नही कर पाते हैं। हार्इस्कूल परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त छात्रों के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि उनको व्यावसायिक विद्यालय में, औद्योगिक विद्यालय में या व्यापारिक विद्यालय में कहाँ जाना चाहिए। कभी-कभी छात्र गलत विद्यालयों में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे विद्यालयों में बाद में वे समायोजित नही हो पाते हैं। छात्रों को उचित अग्रिम शिक्षा का निर्णय लेने के लिए शैक्षिक पथ-प्रदर्शन अवश्य दिया जाए।
४. व्यवसायोंं का ज्ञान देना – स्वतत्रंता प्राप्ति के उपरान्त देश के आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनार्इ गर्इ है। इन पंचवर्षीय योजनाओं ने हमारे नवयुवकों के लिए अवसरों का भण्डार खोल दिया है इन नवीन अवसरों का ज्ञान कम व्यक्तियों को है। भारत में छात्र बिना किसी अवसर की परवाह किये विद्यालयों में प्रवेश ले लेते हैं। उनको इस बात का ज्ञान नही होता कि कौन-सा पाठ्य-विषय किस व्यवसाय या सेवा की आधारशिला तैयार करता है। इसका कुपरिणाम भारत में ‘शिक्षित बेरोजगारं की समस्या है अगर विद्यालयों में निर्देशन द्वारा विभिन्न पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित अवसरों का ज्ञान दे दिया जाय तो बेरोजगारी की समस्या कुछ सीमा तक हल हो सकती है।
. विद्यालय-व्यवस्था, पाठ्य्यक्रम तथा शिक्षण-विधि मेंं परिवर्तन – शिक्षा में पहले की अपेक्षा बहुत से परिवर्तन हुए हैं। पहले शिक्षा बौद्धिक विकास की एक प्रक्रिया मात्र थी। परन्तु आज यह व्यक्तिगत तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान का एक साधन मानी जाती है। मौरिस के अनुसार निश्चयात्मक शिक्षा का, जो कि विभिन्न सामाजिक स्तर के व्यक्तियों को विभिन्न अवसर प्रदान करती है, रूप परिवर्तित होकर प्रजातन्त्रात्मक शिक्षा होता जा रहा है जो कि सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करती है। साहित्यिक पाठ्यक्रम के स्थान पर विस्तृत, वैज्ञानिक तथा सामाजिक पाठ्यक्रम स्वीकार किया जा रहा है जो प्रतिदिन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। समाज तथा विद्यालय में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयत्म किये जा रहे हैं।
वर्तमान समय में शिक्षा बाल केन्द्रित हैं, जहाँ व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धान्त पर अधिक बल दिया जाता है। ये सभी परिवर्तन शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता पर बल देते हैं।

Author: kv1devlalilibrary

Kendirya Vidyalaya No.1, Devlali Near Devi Mandir, Rest Camp Road, Devlali Nashik, Maharashtra-422 401 E-mail: kv1devlibrary@gmail.com Web site: www.kv1devlalilibrary.wordpress.com

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.